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  हिमाचल का 1000 साल पूरे कर चुका चम्बा Chamba शहर 

चंबा भारत के हिमाचल प्रदेश का एक जिला है। हिमाचल प्रदेश का चंबा जिला अपने मंदिरों और हैंडीक्राफ्ट के लिए पुरे विश्व में प्रसिद्ध है। रावी नदी के किनारे 996 मीटर की ऊंचाई पर बसा चंबा पहाड़ी राजाओं की प्राचीन राजधानी थी। चंबा को राजा साहिल वर्मन ने 920 ई. में इस नगर की स्थापना की। इस नगर का नाम उन्होंने अपनी प्रिय पुत्री चंपावती के नाम पर रखा। जो बाद में चम्पा से चम्बा बन गया। चारों ओर से ऊंची पहाड़ियों से घिरा चंबा शहर ने आज भी अपनी प्राचीन संस्कृति और विरासत को संजो कर रखा है। प्राचीन काल की अनेक निशानियां आज भी चंबा में देखी जा सकती हैं।

चम्बा मिलेनियम गेट

अरब के लेखकों ने चंबा के सूर्यवंशी राजपूत शासकों को 'जाब' की उपाधि के साथ लिखा है। अरबी में इसका नाम जाफ, हाब, आब और गाँव नाम भी हैं। इसकी प्राचीन राजधानी ब्रह्मपुर थी। हुएनत्सांग ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है कि यह अलखनंदा और करनाली नदियों के बीच बसा है।  इस प्रकार यह प्रामाणिक माना जाता है कि चंबा नगर 9 वीं शताब्दी के प्रथम दशक में विद्यमान था। इब्न रुस्ता ने लिखा है कि चंबा के शासक प्राय: गुर्जरों और प्रतिहारों से शत्रुता रखते थे। 15 अप्रैल 1948 में इसका विलयन भारत सरकार द्वारा शासित हिमाचल प्रदेश में हो गया।

चंबा के दर्शनीय स्थल  

चंपावती मंदिर Champavati Temple Chamba

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Champavati Mandir
चंबा का चंपावती मंदिर चंबा के राजा साहिल वर्मन की पुत्री चम्पा को समर्पित है। यह मंदिर चंबा की पुलिस चौकी के भवन के पीछे स्थित है। ऐसा माना जाता है कि चंबा की इसी राजकुमारी चंपावती द्वारा अपने पिता साहिल वर्मन को प्रेरित किये जाने पर उन्होंने चम्बा नगर की स्थापना की थी । मंदिर में पत्थरों पर खूबसूरत नक्काशी है और छत को पहिया नुमा बनाया गया है।

लक्ष्मीनारायण मंदिर   Luxminath Temple Chamba

Laxmi Narayan Mandir Chamba Himachal
Luxmi Nath Mandir
लक्ष्मी नारायण मंदिर चंबा के प्रमुख मंदिरों में सबसे विशाल व प्राचीन मंदिर है, भरमौर के 84 मंदिर की तर्ज पर इस मंदिर में भी 84 छोटे बड़े मंदिर है।  ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले यह मन्दिर चम्बा के एतिहासिक चौगान में स्थित था परन्तु बाद में इस मन्दिर को अखंड चंडी राजमहल के साथ स्थापित किया गया। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर राजा साहिल वर्मन ने 10 वीं शताब्दी में बनवाया था। यह मंदिर शिखर शैली में निर्मित है। यह मंदिर पांरपरिक वास्तुकारी और मूर्तिकला का उत्कृष्‍ट उदाहरण है।  मंदिर में एक विमान और गर्भगृह है। मंदिर की छतरियां और पत्थर की छत इसे बर्फबारी से बचाती है। मंदिर का ढांचा मंडप के समान है। 


चौगान Chamba Chowgan

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Chowgan
चम्बा का एतिहासिक चौगान चम्बा के इतिहास को संजोये हुए है यह चौगान ( Chamba Chowgan ) हर साल होने वाले मिंजर मेला के लिए भी जाना जाता है।  चौगान में प्रतिवर्ष मिंजर मेले का आयोजन किया जाता है। एक सप्ताह तक चलने वाले इस मेले में जिला ही नही बल्कि हिमाचल पंजाब से लोग पहुंचते है और यहाँ रात को होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमो का आनंद उठाते है। आजकल तो मिंजर के दौरान हिमाचली कलाकारों के साथ पंजाबी और बोलीवूड के कलाकार भी अपनी कला को प्रस्तुत करने पहुंचते है। इस अवसर पर यहां बड़ी संख्या में सांस्कृतिक और खेलकूद की गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। यह घास का खुला मैदान लगभग 1 किलोमीटर लंबा और 75 मीटर चौड़ा यह मैदान चंबा के बीचों बीच स्थित है। लेकिन अब चौगान चार हिसों में बंट चूका है। आजकल मिंजर मेला ने बड़ा रूप ले लिया है और यह अब अन्तर्राष्ट्रीय मिंजर मेला के नाम से जाना जाता है।


भूरी सिंह संग्रहालय   Bhuri Singh Museum Chamba

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Bhuri Singh Museum
इस संग्रहालय का नाम 1904 से 1919 तक चंबा में शासन करने वाले राजा भूरी सिंह ( Bhuri Singh Museum Chamba) के नाम पर पड़ा। यह संग्रहालय 14 सितंबर 1908 ई. में खुला। राजा भूरी सिंह द्वारा अपने परिवार की बनी चित्रों का संग्रह इस सग्रहालय को दान किया था। इस संग्रहालय में बसहोली और कांगड़ा आर्ट स्कूल की लघु पेंटिग भी रखी गई हैं।


भरमौर Bharmour

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Bharmour
चंबा नगर की राजधानी को पहले ब्रह्मपुरा नाम से जाना जाता था।  घने जंगलों से घिरा भरमौर नगर 2195 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। कथाओं के अनुसार 10 वीं शताब्दी में यहां पर 84 साधू आए थे। उन्होंने राजा से प्रसन्न होकर यहां के राजा को 10 पुत्र और एक पुत्री चंपावती का आशीर्वाद दिया था। यहां बने मंदिरो को चौरासी मंदिर के नाम से जाना जाता है। यंहा लक्ष्मी देवी, गणेश और नरसिंह मंदिर चौरासी मंदिर के अन्तर्गत ही आतें हैं। भरमौर से कुगती पास और कलीचो पास की ओर जाने के लिए उत्तम ट्रैकिंग रूट है। तथा विश्व में केवल एकलोता धर्मराज जी का मंदिर भरमौर में  मौजूद है जिन्हे हम यमराज के नाम से भी जानते। माना जाता है की जब कोई भी व्यक्ति मरता है तो मृत्यु के बाद उसे इस मन्दिर में आना ही होगा इसी मंदिर में हर आत्मा के कर्मों का हिसाब होगा और उसके कार्यो के अनुसार स्वर्ग या नरक की प्राप्ति होगी।


वजरेश्वरी मंदिर  Bajreshwari Temple Chamba

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Brajeshwari Devi Mandir
यह प्राचीन मंदिर एक हजार साल पुराना माना जाता है। प्रकाश की देवी वजरेश्वरी को समर्पित यह मंदिर नगर के उत्तरी हिस्से में स्थित जनसाली बाजार के अंत में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण शिखर शैली में हुआ है और इसकी छत लकड़ी से बनी है, इस मंदिर के शिखर पर बेहतरीन नक्काशी की गई है, जो आकर्षण का केन्द्र है।

सुई माता मंदिर Suhi Mata Temple Chamba

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Suhi Mata Tample
चंबा के निवासियों के लिए अपना जीवन त्यागने वाली यहां की रानी सुनयना को यह मंदिर समर्पित है। यह मंदिर शाहमदार की पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ सुई माता नें कुछ समय के लिए विश्राम किया था। माना जाता है की चंबा के निर्माण के कुछ समय बाद यहाँ पर पानी का सकट उत्पन्न हो गया, तब रानी सुनयना को सपने में कुल देवी ने दर्शन दिए और कुल देवी ने कहा की राज परिवार से अगर कोई व्यक्ति अपना बलिदान देगा तो यह संकट समाप्त हो जायेगा। तब रानी सुनयना ने प्रजा की खातिर अपना बलिदान दिया और जिवित समाधी ली और तब जाकर चंबा का पानी का संकट समाप्त हुआ। तब से यहाँ सुई माता की याद में यंहा पर हर साल सुई मेले का आयोजन होता है। हर साल यह चैत महीने से शुरु होकर यह मेला बैसाख महीने तक चलता है। यह मेला विशेषकर महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। मेले में रानी की याद में पारम्परिक गीत गाए है, वंही मेले के दुसरे दिन लोग माता को श्रद्धांजलि‍ देने के लिए मलुना स्थित रानी के वलिदान स्थल तक जाते हैं।       

      

चामुन्डा देवी मंदिर Chamunda Devi Temple Chamba

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Chamunda Devi Temple
यह मंदिर पहाड़ की चोटी पर स्थित है जहां से चंबा की स्लेट निर्मित छतों और रावी नदी व उसके आसपास का सुन्दर नजारा देखा जा सकता है। मंदिर एक ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है और देवी दुर्गा को समर्पित है। मंदिर के दरवाजों के ऊपर, स्तम्भों और छत पर खूबसूरत नक्काशी की गई है। मंदिर के पीछे शिव का एक छोटा मंदिर है। मंदिर चंबा से तीन किलोमीटर दूर चंबा-जम्मुहार रोड़ के दायीं ओर है। 


हरीराय मंदिर Hariray Temple Chamba

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Hariray Tample
भगवान विष्णु का यह मंदिर 11 शताब्दी में बना था। कहा जाता है कि यह मंदिर सालबाहन ने बनवाया था। मंदिर चौगान के उत्तर पश्चिम किनारे पर स्थित है। मंदिर के शिखर पर बेहतरीन नक्काशी की गई है। हरीराय मंदिर में चतुमूर्ति आकार में भगवान विष्णु की कांसे की बनी अदभुत मूर्ति स्थापित है। 

रंगमहल Rang Mahal Chamba

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Rang Mahal

यह प्राचीन महल चंबा के सुराड़ा मोहल्ले में स्थित है।  इस महल की नींव राजा उमेद सिंह ने (1748-1768) डाली थी। महल का दक्षिणी हिस्सा राज श्री सिंह ने 1860 में बनवाया था। यह महल मुगल और ब्रिटिश शैली का मिश्रित उदाहरण है। यह महल यहां के शासकों का निवास स्थल था।

अखंड चंडी महल Akhand Chandi Palace Chamba

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Akhand Chandi Palace
चंबा के शाही परिवारों का यह निवास स्थल राजा उमेद सिंह ने 1748 से 1764 के बीच बनवाया था। महल का पुनरोद्धार राजा शाम सिंह के कार्यकाल में ब्रिटिश इंजीनियरों की मदद से किया गया। 1879 में कैप्टन मार्शल ने महल में दरबार हॉल बनवाया। बाद में राजा भूरी सिंह के कार्यकाल में इसमें जनाना महल जोड़ा गया। महल की बनावट में ब्रिटिश और मुगलों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। 

खजियार Khajjiar Chamba

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Khajiar
खजियार चम्बा की सबसे खूबसूरत जगह है। यह चम्बा से 22 कि. मी की दूरी पर है। लाखो की तादाद में हर वर्ष लोग यहाँ घूमने के लिए आते है। यहाँ एक झील है जो की काफी पुरानी है। और जिसका दृश्य लोगों के मन को भाता है। इसे मिनी स्विट्ज़रलैंड के नाम से भी जाना जाता है।


रावी नदी  Ravi River Chamba

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Ravi River
चंबा जिला में 3 प्रमुख नदियाँ बहती है, रावी, साल, स्युल। चंबा की रावी नदी, चंबा ही नही उत्तर भारत की प्रमुख नदियों में एक है।  इसका ऋग्वैदिक कालीन नाम परुष्णी है। सिंधु के सहायक पंचनद में सबसे छोटी नदी हैं। रावी नदी हिमाचल प्रदेश  में रोहतांग दर्रे से निकल कर हिमाचल प्रदेश, जम्‍मू कश्‍मीर तथा पंजाब होते हुए पाकिस्तान से बहती हुयी झांग जिले की सीमा पर चिनाव नदी में मिल जाती हैं।

 भारत का मिनी स्विट्जरलैंड खज्जियार, बना पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र



खज्जियार :  भारतवर्ष के हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिला में बसा खज्जियार घने चीड़ और देवदार जंगलों से घिरा हुआ एक छोटा बहुत ही सुन्दर मैदान है। जिसमें एक सुंदर झील स्थित है।  प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण इसे भारत का "छोटा स्विटजरलैंड" ("मिनी स्विटजरलैंड") mini switzerland in india भी माना जाता है। यहाँ देश भर से पर्यटक घुमने के लिए पहुंचते है और सर्दियों के मौसम में तो यहाँ पर्यटक काफी संख्या में पहुंचते है । खजियार एक छोटे से पठार पर स्थित है, जिसके बीच में एक छोटी सी धारा से भरी झील है जो चारों और से जंगलों से घिरा हुआ है। यह पश्चिमी हिमालय की धौलाधार पर्वतमाला की तलहटी में समुद्र तल से लगभग 2,000 मीटर की दूरी पर और चोटियों को देखा जा सकता है।  यह कालातोप खजियार अभयारण्य का हिस्सा है।

खज्जियार Khjjiar का नाम मिनी स्विटजरलैंड Mini Switzerland कैसे पड़ा 

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Khajjiar Chamba

7 जुलाई 1992 को, स्विस दूत विली पी ब्लेज़र, वाइस काउंसलर और भारत में स्विट्जरलैंड के चांसरी के प्रमुख ने इसे "मिनी स्विटज़रलैंड" mini switzerland in india कहकर खजियार को विश्व पर्यटन मानचित्र पर लाया। खज्जियार दुनिया के 160 स्थानों में से एक है, जो स्विट्जरलैंड के साथ समानता रखता है।  रिकॉर्ड के अनुसार, यहां से एक पत्थर लिया गया था और स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में बनी पत्थर की मूर्तिकला का हिस्सा बनाया गया था।

खजजी नाग मंदिर Khajji Naag Temple Khjjiar Chamba

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Khajji-Nag
खज्जियार Khajjiar लोकप्रिय खजजी नाग मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है जिसे सर्प देव को समर्पित किया गया है। यह मंदिर 10 वीं शताब्दी पूर्व का है, छत और लकड़ी के खूटी पर अलग-अलग पैटर्न और छवियां बनी है। हिंदू और मुगल शैलियों के आर्किटेक्चर का एक विलक्षण मिश्रण लकड़ी के नक्काशी में छत और लकड़ी के खूटी पर परिलक्षित होता है। मंदिर में एक विशाल मंडल हॉल है जो पर्याप्त रूप से लकड़ी के समर्थन से ढका है। गुंबद के आकार का मंदिर स्थानीय रूप से चूना पत्थर खदानों से निकाले जाने वाले स्लेट से बना है। इसके अलावा शिव और हडिम्बा देवी के अन्य मंदिर भी हैं।


         विश्व का प्राचीनतम धर्म हिन्दू Hindu Religion


हिन्दू धर्म Hindu Religion : सनातन धर्म एक धर्म या, जीवन पद्धति है जिसके अनुयायी ज्यादातर भारत ,नेपाल और मॉरिशस में अधिक संख्या में रहते हैं। इसे विश्व का प्राचीनतम धर्म माना जाता है। इस धर्म को वैदिक सनातन व वर्णाश्रम धर्म भी कहा जाता है जिसका अर्थ है कि इसकी उत्पत्ति मानव की उत्पत्ति से भी पहले से है। कई विद्वान लोग हिन्दू धर्म को भारत की विभिन्न संस्कृतियों एवं परम्पराओं का सम्मिश्रण मानते हैं जिसका कोई  भी संस्थापक नहीं है। इसे सनातन धर्म Sanatan Dharma अथवा वैदिक धर्म Vadic Dharma भी कहते हैं। इण्डोनेशिया में इस धर्म का नाम "हिन्दु आगम" है। हिन्दू Hindu केवल एक धर्म या सम्प्रदाय ही नहीं है अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है। यह धर्म अपने अन्दर कई अलग-अलग उपासना पद्धतियाँ, मत, सम्प्रदाय और दर्शन समेटे हुए हैं। अनुयायियों की संख्या के आधार पर ये विश्व का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है। संख्या के आधार पर इसके अधिकतर उपासक भारत में हैं और प्रतिशत के आधार पर नेपाल में हैं। हालाँकि इसमें कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन वास्तव में यह एकेश्वरवादी धर्म है।


सनातन धर्म Sanatan Dharma पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। हालाँकि इसके इतिहास के बारे में अनेक विद्वानों के अनेक मत हैं। आधुनिक इतिहासकार हड़प्पा, मेहरगढ़ आदि पुरातात्विक अन्वेषणों के आधार पर इस धर्म का इतिहास कुछ हज़ार वर्ष पुराना मानते हैं। जहाँ भारत की सिन्धु घाटी सभ्यता Indus Vally Civilization में हिन्दू धर्म Hindu Religion के कई चिह्न मिलते हैं। इनमें एक अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, भगवान शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, शिवलिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं। इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के अनुसार इस सभ्यता के अन्त के दौरान मध्य एशिया से एक अन्य जाति का आगमन हुआ, जो स्वयं को आर्य कहते थे और संस्कृत नाम की एक हिन्द यूरोपीय भाषा बोलते थे। एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता Indus Vally Civilization के लोग स्वयं ही आर्य थे और उनका मूलस्थान भारत India ही था।


आर्यों Arya की सभ्यता को वैदिक Vadic सभ्यता कहते हैं। पहले दृष्टिकोण के अनुसार लगभग 1700 ईसा पूर्व में आर्य अफ़्ग़ानिस्तान, कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में बस गए। तभी से वो लोग अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए वैदिक संस्कृत में मन्त्र रचने लगे। पहले चार वेद रचे गए, जिनमें ऋग्वेद प्रथम था। उसके बाद उपनिषद जैसे ग्रन्थ आए। हिन्दू मान्यता के अनुसार वेद, उपनिषद आदि ग्रन्थ अनादि, नित्य हैं, ईश्वर की कृपा से अलग-अलग मन्त्रद्रष्टा ऋषियों को अलग-अलग ग्रन्थों का ज्ञान प्राप्त हुआ जिन्होंने फिर उन्हें लिपिबद्ध किया। बौद्ध और धर्मों के अलग हो जाने के बाद वैदिक धर्म में काफ़ी परिवर्तन आया। नये देवता और नये दर्शन उभरे। इस तरह आधुनिक हिन्दू धर्म का जन्म हुआ।
                                        

भारतवर्ष को प्राचीन ऋषियों ने "हिन्दुस्थान" India नाम दिया था, जिसका अपभ्रंश "हिन्दुस्तान" है। "बृहस्पति आगम" के अनुसार: "हिन्दू" शब्द "सिन्धु" से बना माना जाता है। संस्कृत में सिन्धु शब्द के दो मुख्य अर्थ हैं - पहला, सिन्धु नदी जो मानसरोवर के पास से निकल कर लद्दाख़ और पाकिस्तान से बहती हुई समुद्र में मिलती है, दूसरा - कोई समुद्र या जलराशि। ऋग्वेद की नदीस्तुति के अनुसार वे सात नदियाँ थीं : सिन्धु, सरस्वती, वितस्ता (झेलम), शुतुद्रि (सतलुज), विपाशा (व्यास), परुषिणी (रावी) और अस्किनी (चेनाब)। एक अन्य विचार के अनुसार हिमालय के प्रथम अक्षर "हि" एवं इन्दु का अन्तिम अक्षर "न्दु", इन दोनों अक्षरों को मिलाकर शब्द बना "हिन्दु" और यह भू-भाग हिन्दुस्थान कहलाया। हिन्दू शब्द उस समय धर्म के बजाय राष्ट्रीयता के रूप में प्रयुक्त होता था। चूँकि उस समय भारत में केवल वैदिक धर्म को ही मानने वाले लोग थे, बल्कि तब तक अन्य किसी धर्म का उदय नहीं हुआ था इसलिए "हिन्दू" शब्द सभी भारतीयों के लिए प्रयुक्त होता था। भारत में केवल वैदिक धर्मावलम्बियों (हिन्दुओं) के बसने के कारण कालान्तर में विदेशियों ने इस शब्द को धर्म के सन्दर्भ में प्रयोग करना शुरु कर दिया।

आम तौर पर हिन्दू शब्द को अनेक विश्लेषकों ने विदेशियों द्वारा दिया गया शब्द माना है। इस धारणा के अनुसार हिन्दू एक फ़ारसी शब्द है। हिन्दू धर्म को सनातन धर्म या वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म भी कहा जाता है। ऋग्वेद में सप्त सिन्धु का उल्लेख मिलता है - वो भूमि जहाँ आर्य सबसे पहले बसे थे। भाषाविदों के अनुसार हिन्द आर्य भाषाओं की "स्" ध्वनि (संस्कृत का व्यंजन "स्") ईरानी भाषाओं की "ह्" ध्वनि में बदल जाती है। इसलिए सप्त सिन्धु अवेस्तन भाषा (पारसियों की धर्मभाषा) में जाकर हफ्त हिन्दु में परिवर्तित हो गया (अवेस्ता: वेन्दीदाद, फ़र्गर्द 1.18)। इसके बाद ईरानियों ने सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दु नाम दिया। जब अरब से मुस्लिम भारत में आए, तो उन्होंने भारत के मूल धर्मावलम्बियों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया। चारों वेदों में, पुराणों में, महाभारत में, स्मृतियों में इस धर्म को हिन्दु धर्म नहीं कहा है, वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म कहा है।

हिन्दू धर्म Hindu Religion के सिद्धान्त :

1. ईश्वर एक नाम अनेक।
2. ब्रह्म या परम तत्त्व सर्वव्यापी है।
3. जीवमात्र की सेवा ही परमात्मा की सेवा है।
4. हिन्दुत्व का लक्ष्य स्वर्ग-नरक से ऊपर।
5. हिन्दुओं में कोई एक पैगम्बर नहीं है।
6. धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर बार-बार पैदा होते हैं।
7. परोपकार पुण्य है, दूसरों को कष्ट देना पाप है।
8.  ईश्वर से डरें नहीं, प्रेम करें और प्रेरणा लें।
9.  स्त्री आदरणीय है।
10.  हिन्दुत्व का लक्ष्य पुरुषार्थ है और मध्य मार्ग को सर्वोत्तम माना गया है।
11. हिन्दुत्व का वास हिन्दू के मन, संस्कार और परम्पराओं में।
12. पर्यावरण की रक्षा को उच्च प्राथमिकता।
13. आत्मा अजर-अमर है।
14.  हिन्दू दृष्टि समतावादी एवं समन्वयवादी।
15. सबसे बड़ा मंत्र गायत्री मंत्र।
16. हिन्दुओं के पर्व और त्योहार खुशियों से जुड़े हैं।
17. सती का अर्थ पति के प्रति सत्यनिष्ठा है।
18. हिन्दुत्व एकत्व का दर्शन है।


भारत के लोग रॉलट ( रौलेट ) एक्ट के विरोध में क्यों थे ? 


उत्तर

रॉलट (रौलेट) एक्ट इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल द्वारा 1919 ई० में पास किया गया। इसे काला कानून भी कहते हैं। उस समय प्रथम महायुद्ध के कारण भारत को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का प्रसार अंग्रेजी साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हो सकता था। अतः सरकार ने राष्ट्रीय आंदौलन का दमन करना आवश्यक समझा और बहुत जल्दबाजी में रॉलट (रौलेट) एक्ट पास कर दिया। 

इस अधिनियम के अनुसार सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने और राजनीतिक कैदियों को दो साल तक बिना मुकद्दमा चलाए नज़रबंद करने का अधिकार मिल गया। इस प्रकार इस अधिनियम ने भारतीयों की स्वतंत्रता का अपहरण कर लिया। साथ ही वे किसी भी क्षण बंदी बनाए जाने के भय से चिंतित रहने लगे। ऐसी अवस्था में रॉलट ( रौलेट ) एक्ट का विरोध होना स्वाभाविक ही था।

 

Why were the people of India opposed to the Rowlatt Act?



Answer

The Rowlatt Act was passed by the Imperial Legislative Council in 1919. It is also called black law. At that time, India was facing many problems due to the First World War. In such a situation, the spread of the national movement in India could prove fatal for the British Empire. Therefore, the government considered it necessary to suppress the national movement and very hastily passed the Rowlatt Act. 

According to this act, the government got the right to suppress political activities and to detain political prisoners without trial for two years. Thus this act hijacked the freedom of Indians. At the same time they began to worry about the fear of being imprisoned at any moment. In such a situation, it was natural to oppose the Rowlatt Act.


पहले विश्व युद्ध ने भारत में  आंदोलन के विकास में किस प्रकार योगदान दिया ? 


उत्तर 

पहला विश्व युद्ध जहाँ मानवता के लिए विनाश का कारण बना वंही इसके कारण राष्ट्रवाद को भी बल मिला। भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में प्रथम विश्व युद्ध के योगदान का वर्णन इस प्रकार है--

1. करों में वृद्धि -- पहले विश्व युद्घ के कारण एकाएक रक्षा व्यय बढ़ गया। इस खर्च को पूरा करने के लिए सरकार ने करों में वृद्धि कर दी। इसके अतिरिक्त सीमा शुल्क को भी बढ़ा दिया गया। आयकर के रूप में नया कर भी लगा दिया गया। इससे जनता में रोष फैल गया जिसने राष्ट्रवाद को जन्म दिया।

2. कीमतों में वृद्धि -- पहले विश्व युद्ध के दौरान खाद्य पदार्थों का भारी अभाव हो गया। फलस्वरूप कीमतें लगभग दुगनी हो गईं। आम आदमी का जीवन कष्टमय हो गया। अत: लोग विदेशी शासन से मुक्ति के बारें में सोचने लगे। यह सोच राष्ट्रीय आंदोलन का आधार बनी।

3. सिपाहियों की जबरन भर्ती -- पहले विश्व युद्ध में अत्यधिक सैरिकों के मरने के कारण सरकार को अधिक-से-अधिक सैनिकों की आवश्यकता थी। अत: गांवों से नौजवानों को ज़बरदस्ती सेना में भर्ती किया गया। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार के प्रति विशेष रोष था।

4. भारतीय उदयोगपतियों में रोष --
भारत में अब विदेशी पूंजी बड़े पैमाने पर लगाई जाने लगी। भारतीय उद्योगपति चाहते थे कि सरकार आयातों पर भारी कस्टम ड्यूटी लगाए तथा उन्हें सुविधाएं देकर भारतीय उद्योगों को सुरक्षा प्रदान करे। अब उन्हें भी आभास होने लगा कि केवल एक दृढ राष्ट्रवादी आंदोलन तथा एक स्वाधीन भारतीय सरकार के द्वारा ही सुरक्षा के लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं।

5. मज़दूरों तथा दस्तकारों में रोष -- बेरोज़गारी तथा महंगाई से पीड़ित मज़दूर तथा दस्तकार भी राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय हो उठे। उनके लिए निर्वाह करना भी कठिन था। वे सोचने लगे कि यदि भूखा ही मरना है तो स्वदेशी सरकार की छाया में ही क्यों न मरा जाए। अत: वे स्वतंत्रता के लिए कोई भी आहुति देने के लिए तत्पर हो उठे।

इस तरह भारतीय समाज के सभी वर्ग अंग्रेज़ी सरकार की नीतियां से पीड़ित थे। अत: उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए राष्ट्रवादी आन्दोलन आरंभ कर दिया।

 

How did the First World War contribute to the development of the movement in India?



Answer

While the First World War caused destruction to humanity, it also gave a boost to nationalism. The contribution of the First World War in the development of the national movement in India is described as follows- 

 

1. Increase in taxes --  Due to the First World War, the defense expenditure suddenly increased. To meet this expenditure, the government increased taxes. In addition, customs duty was also increased. A new tax was also imposed in the form of income tax. This caused public anger which gave rise to nationalism.

2. Increase in Prices --  During the First World War there was a severe shortage of food items. As a result the prices almost doubled. The life of the common man became painful. So people started thinking about freedom from foreign rule. This thinking became the basis of the national movement.

3. Forced Recruitment of Soldiers -- The government needed more and more soldiers because of the excessive casualties in the First World War. Therefore, the youth from the villages were forcibly recruited into the army. This caused a special resentment towards the government in rural areas.

4. Fury among Indian industrialists -- Now foreign capital started investing in India on a large scale. Indian industrialists wanted the government to impose heavy customs duty on imports and provide security to Indian industries by providing them facilities. Now they also began to realize that the goals of security can be achieved only through a firm nationalist movement and an independent Indian government. 

5. Fury among workers and artisans -- Workers and artisans suffering from unemployment and inflation also became active in the national movement. It was also difficult for them to survive. They started thinking that if you want to die of hunger then why not die under the shadow of the indigenous government. So they were ready to make any sacrifice for freedom.

In this way all sections of the Indian society were suffering from the policies of the British government. Therefore, he started the nationalist movement for independence.


उपनिवेशों में राष्ट्रवाद के उदय की प्रक्रिया उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन से जुडी हुई क्यों थी ?

उपनिवेशों में राष्ट्रवाद के उदय की प्रक्रिया निश्चित रूप से उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन से जुड़ी हुई थी। औपनिवेशिक शासकों के विरुध संघर्ष के दौरान लोग आपसी एकता को पहचानने लगे थे। उनका समान रूप से उत्पीड़न और दमन हुआ था। इस सांझा अनुभव ने उन्हें एकता के सूत्र में बाँध दिया। वे यह भी जान गए थे कि विदेशी शासकों को एकजुट होकर ही देश से बाहर निकाला जा सकता है। उनकी इस भावना ने भी राष्ट्रवाद के उदय में सहायता पहुंचाई।


Why was the process of rise of nationalism in the colonies linked to the anti-colonial movement?


The process of rise of nationalism in the colonies was definitely linked to the anti-colonial movement. During the struggle against the colonial rulers, people began to recognize mutual unity. They were equally oppressed and oppressed. This shared experience tied them in the thread of unity. They also knew that foreign rulers could be driven out of the country only by uniting. This spirit of his also helped in the rise of nationalism.

गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन को वापिस लेने का फैसला क्‍यों लिया ?

वह कौन-से कारण थे जिनको लेकर गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापिस लेने का फैसला किया?



उत्तर :

असहयोग आंदोलन अहिंसा पर आधारित था। परिणामस्वरूप शीघ्र ही यह आंदोलन बल पकड़ गया। विद्यार्थियों ने सरकारी विद्यालयों का बहिष्कार कर दिया। जनता ने बीच चौराहों पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। ये सभी गतिविधियाँ शांतिपूर्ण थीं, दुर्भाग्यवश उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा नामक स्थान पर बाज़ार से गुज़र रहा शांतिपूर्ण जुलूस पुलिस के साथ हिंसक टकराव में बदल गया और भीड़ ने पुलिस थाने को आग लगा दी। इस हिंसात्मक घटना से दुःखी होकर 12 फरवरी, 1922 को गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन वापिस ले लिया।

 
  

Why did Gandhi ji decide to withdraw the non-cooperation movement?


What were the reasons for which Gandhi ji decided to withdraw the non-cooperation movement?



Answer :

The non-cooperation movement was based on non-violence. As a result, the movement soon gained momentum. Students boycotted government schools. People lit Holi of foreign clothes at the middle squares. All these activities were peaceful, unfortunately,  A peaceful procession passing through a market place in Uttar Pradesh's Chauri-Chaura turned into a violent confrontation with the police and the mob torched the police station. Saddened by this violent incident, Gandhi ji withdrew the non-cooperation movement on February 12, 1922.
 
 

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